धरती की सांस और गांवों की आस: बिहार की 4526 वेटलैंड, पर्यावरण की ‘किडनी’ बन लाखों लोगों को दे रहीं रोजगार
बिहार में 4526 आर्द्रभूमियां पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ लाखों लोगों की आजीविका का आधार बनी हुई हैं। ये वेटलैंड प्रदूषित जल को शुद्ध कर ‘धरती की किडनी’ की भूमिका निभाती हैं और मछली, मखाना व अन्य उत्पादों के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देती हैं।
पटना: बिहार में 4500 से अधिक आर्द्रभूमियां (वेटलैंड) पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। राज्य में कुल 4526 वेटलैंड चिन्हित की गई हैं, जिनमें से 4316 का भू-सत्यापन पूरा किया जा चुका है। 2.25 हेक्टेयर से बड़ी ये आर्द्रभूमियां प्रदूषित जल को प्राकृतिक रूप से छानकर शुद्ध करती हैं, इसलिए इन्हें धरती की ‘किडनी’ कहा जाता है।
आर्द्रभूमि वे क्षेत्र होते हैं जो न पूरी तरह जमीन होते हैं और न ही पूरी तरह पानी। ये जमीन और जल का संगम स्थल होते हैं, जहां स्थायी या मौसमी रूप से पानी भरा रहता है। दलदल, झील, नदी तट, जलाशय, धान के खेत और मैंग्रोव वन इसके उदाहरण हैं। ये क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में सहायक होते हैं।
बिहार की वेटलैंड लाखों लोगों की आजीविका का प्रमुख आधार हैं। मछली पालन पर निर्भर बड़ी आबादी के लिए ये जीवनरेखा समान हैं। राज्य ने पिछले दशक में मछली उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की है और अब देश में चौथे स्थान पर पहुंच चुका है। खगड़िया में करीब 32 हजार और भोजपुर में 19 हजार से अधिक लोग मछली कारोबार से जुड़े हैं।
इसी तरह मखाना उत्पादन, प्रोसेसिंग और व्यापार से पांच लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। मिथिला क्षेत्र में मखाना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। इसके अलावा जूट और सिंघाड़ा जैसी नकदी फसलें भी वेटलैंड पारिस्थितिकी पर निर्भर हैं।
जैव विविधता की दृष्टि से भी ये क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं। हर साल प्रवासी पक्षियों का आगमन बिहार की कई वेटलैंड में होता है। राज्य की छह वेटलैंड को रामसर साइट का दर्जा प्राप्त है, जिनमें कांवर झील, नागी-नकटी पक्षी आश्रयणी, गोगाबिल, गोकुल जलाशय और उदयपुर झील प्रमुख हैं।
स्पष्ट है कि बिहार की आर्द्रभूमियां सिर्फ पर्यावरण की रक्षा ही नहीं कर रहीं, बल्कि ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन की मजबूत नींव भी तैयार कर रही हैं।
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