बिहार में 'औद्योगिक क्रांति' का नया अध्याय: कीरतपुर गांव में लगी करोड़ों की सलाइन वाटर फैक्ट्री, 400 युवाओं को मिला रोजगार

बिहार के वैशाली (हाजीपुर) के कीरतपुर गांव में करोड़ों की लागत से सूबे की पहली सलाइन वाटर फैक्ट्री शुरू हुई है। इस उद्योग से गांव के 400 युवाओं और महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिला है और पलायन पर ब्रेक लगा है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

बिहार में 'औद्योगिक क्रांति' का नया अध्याय: कीरतपुर गांव में लगी करोड़ों की सलाइन वाटर फैक्ट्री, 400 युवाओं को मिला रोजगार
माहिलाओ को मिला रोजगार
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​हाजीपुर (वैशाली)। बिहार के ग्रामीण इलाकों की सूरत अब तेजी से बदल रही है। कल तक जो गांव सिर्फ खेती-किसानी तक सीमित थे, वे अब सूबे की औद्योगिक क्रांति के नए गवाह बन रहे हैं। इसका सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण वैशाली जिले के भगवानपुर प्रखंड स्थित कीरतपुर गांव में देखने को मिल रहा है। यहां बैंक लोन की मदद से करोड़ों रुपये की लागत से स्थापित एक सलाइन वाटर फैक्ट्री ने न सिर्फ बिहार की पहली ऐसी यूनिट होने का कीर्तिमान रचा है, बल्कि रोजगार की तलाश में भटकते सैकड़ों युवाओं की जिंदगी भी बदल दी है।

​'बढ़ते बिहार' की नई पहचान, दिन-रात चल रही हैं शिफ्टें:

​यह सलाइन वाटर फैक्ट्री आज आत्मनिर्भर और "बढ़ते बिहार" का एक जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है। फैक्ट्री की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां दिन और रात, दोनों शिफ्टों में मिलाकर लगभग 400 कर्मचारी लगातार काम कर रहे हैं। सबसे सुखद पहलू यह है कि इस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में काम करने वाले अधिकांश कर्मचारी स्थानीय गांवों के ही युवा और युवतियां हैं।

​रुका पलायन: कल तक जो जाते थे दिल्ली-मुंबई, आज अपने गांव में पा रहे रोजगार, एक दौर था जब वैशाली और आसपास के युवाओं को दो वक्त की रोटी और अदद नौकरी के लिए दिल्ली, मुंबई, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों की ओर पलायन करना पड़ता था। आज वही युवा अपने घर-आंगन के पास, अपनों के बीच रहकर सम्मानजनक रोजगार पाकर बेहद खुश हैं।

हैरानी और गर्व की बात यह भी है कि इस फैक्ट्री में अब सिर्फ बिहार के लोग ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से आए युवक भी काम कर रहे हैं। यह इस बात का साफ संकेत है कि बिहार अब सिर्फ मजदूर देने वाला नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों के लोगों को भी रोजगार देने वाला राज्य बनने की राह पर अग्रसर है।

​महिला सशक्तिकरण की मिसाल: आधी आबादी को मिल रही प्राथमिकता :

​इस फैक्ट्री की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) यहां महिला कामगारों को दी जा रही विशेष प्राथमिकता है। गांव की रूढ़िवादी सोच को पीछे छोड़ते हुए बड़ी संख्या में महिलाएं यहाँ कुशल (Skilled) और अकुशल (Unskilled) दोनों तरह के विभागों में अपनी जिम्मेदारी संभाल रही हैं।

फैक्ट्री में काम करने वाली महिला कर्मियों ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा: "पहले घर-परिवार और बच्चों से दूर रहकर दूसरे राज्यों में काम तलाशना हमारी मजबूरी थी। परिवार से दूर रहना बहुत पीड़ादायक होता था। लेकिन आज हमारे अपने ही गांव में हमें सम्मानजनक नौकरी मिल गई है। यहां सिर्फ काम ही नहीं मिलता, बल्कि समय पर वेतन और स्वास्थ्य सुविधाओं की भी पूरी व्यवस्था है।"

​पहले दी गई ट्रेनिंग, अब सुधर रही गांव की आर्थिक सेहत :

​फैक्ट्री प्रबंधन के अनुसार, स्थानीय युवाओं को रोजगार पर रखने से पहले उन्हें आधुनिक तकनीक और मशीनों के संचालन के लिए विशेष कौशल प्रशिक्षण (Skill Training) दिया गया। इस पहल का असर अब पूरे इलाके पर दिखने लगा है। फैक्ट्री के चालू होने से कीरतपुर और आसपास के गांवों की आर्थिक स्थिति में भारी सुधार हुआ है। लोगों की क्रय शक्ति बढ़ी है, जिससे स्थानीय बाजारों में भी रौनक लौट आई है।

स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि कीरतपुर की यह सलाइन वाटर फैक्ट्री पूरे बिहार के लिए एक रोल मॉडल (प्रेरणा) है। इसने साबित कर दिया है कि अगर सही सोच और संसाधनों का तालमेल हो, तो बिहार के गांवों में भी उद्योग खड़े किए जा सकते हैं और पलायन की इस दंश को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है।