भारत में जल्द चलेंगे 'प्लास्टिक नोट'! RBI ने शुरू की तैयारी, जानें आपके पर्स में कब आएंगे नए नोट
आरबीआई भारत में कागजी नोटों की जगह प्लास्टिक (पॉलिमर) के नोट चलाने की तैयारी में है! जानिए प्लास्टिक नोटों के फायदे, पर्यावरण पर इसका असर और यह फैसला क्यों लिया जा रहा है।
नई दिल्ली | पटना : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर देश में पारंपरिक कागजी नोटों की जगह प्लास्टिक (पॉलिमर) के नोट चलाने की तैयारी में जुट गया है। करीब 15 साल पहले साल 2009-2012 के दौरान की गई एक अधूरी कोशिश के बाद, अब इस प्रोजेक्ट को नए सिरे से रफ्तार दी जा रही है। हाल ही में रिजर्व बैंक की अनुषंगी कंपनी 'भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड' (BRBNMPL) द्वारा जारी एक टेंडर से यह साफ हो गया है कि देश की मुद्रा प्रणाली में एक बड़ा बदलाव आने वाला है।
BRBNMPL ने विशेष सुरक्षा विशेषताओं वाली 3.4 करोड़ पॉलिमर शीट्स की आपूर्ति के लिए बोलियां आमंत्रित की हैं। टेंडर दस्तावेज के मुताबिक, यह शीट्स "तत्काल आवश्यकता" के तहत मांगी गई हैं। यदि यह फील्ड ट्रायल सफल रहता है, तो BRBNMPL और सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) मिलकर बड़े पैमाने पर इन प्लास्टिक नोटों की छपाई शुरू करेंगे।
आज ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड जैसे विकसित देशों में भी प्लास्टिक (पॉलीमर) के नोट इस्तेमाल किये जा रहे है
आखिर क्यों पड़ी प्लास्टिक नोटों की जरूरत?
वर्तमान में भारत में इस्तेमाल होने वाले करेंसी नोट 100% सूती (कॉटन) कागज से बनते हैं। हाथ से बार-बार इस्तेमाल होने, पानी में भीगने या मुड़ने के कारण ये नोट बहुत जल्दी खराब और गंदे हो जाते हैं। प्लास्टिक नोटों के कई ऐसे बड़े फायदे हैं जो इसे पारंपरिक नोटों से बेहतर बनाते हैं:
- 2 से 6 गुना अधिक टिकाऊ (Longevity): प्लास्टिक नोट आसानी से फटते नहीं हैं और न ही पानी में गलते हैं। छोटे मूल्यवर्ग (जैसे ₹10, ₹20) के नोट जिनका लेनदेन सबसे ज्यादा होता है, उनकी आयु प्लास्टिक पर छापने से काफी बढ़ जाएगी।
- पर्यावरण के अनुकूल (Eco-Friendly): एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, प्लास्टिक नोटों का कार्बन फुटप्रिंट कागजी नोटों से काफी कम है। खराब होने पर इन प्लास्टिक नोटों को रीसाइकिल करके कंपोस्ट बिन या पाइप जैसे उत्पाद बनाए जा सकते हैं।
- हजारों करोड़ की बचत (Cost Saving): नए नोट छापने, उन्हें देशभर में ट्रांसपोर्ट करने और फिर खराब हो चुके पुराने नोटों को नष्ट करने में सरकार का भारी खर्च होता है। नोटों की लाइफ लंबी होने से बार-बार छपाई का खर्च बचेगा।
आंकड़ों की जुबानी: भारी-भरकम छपाई खर्च का गणित
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, केवल पिछले तीन वर्षों में बैंक ने 8,270 करोड़ नए नोट बाजार में उतारे, जबकि इसी अवधि में कटे-फटे और गंदे होने के कारण 6,213 करोड़ पुराने नोटों को नष्ट करना पड़ा। यानी आरबीआई को हर 4 नए नोट जारी करने के साथ 3 पुराने नोट नष्ट करने पड़ते हैं।
पिछले एक दशक में केंद्रीय बैंक ने करीब 26,000 करोड़ नोट छापने पर ₹52,095 करोड़ से अधिक खर्च किए हैं। प्लास्टिक करेंसी लागू होने से इस खर्च में भारी कटौती संभव है।
दुनिया के 50 से अधिक देशों में सफल है 'प्लास्टिक करेंसी'
ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले साल 1988 में प्लास्टिक बैंकनोट पेश किए थे। आज ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड जैसे विकसित देशों के अलावा हमारे पड़ोसी देश जैसे थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया और सिंगापुर भी प्लास्टिक करेंसी का सफलता से इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत के इस कदम से देश की बैंकिंग प्रणाली और अधिक आधुनिक, सुरक्षित और टिकाऊ बनने की उम्मीद है।