जय जगन्नाथ! पुरी में उमड़ा आस्था का महासैलाब; जानिए महाप्रभु के रथ 'नंदिघोष' और 15 दिन बीमार रहने की अनोखी परंपरा

पुरी में विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा की धूम! जानिए तीन विशाल रथों की खासियत, महाप्रभु के बीमार होने की परंपरा (अनासिर) और 'छेरा पहरा' की रस्म का पूरा इतिहास।

जय जगन्नाथ! पुरी में उमड़ा आस्था का महासैलाब; जानिए महाप्रभु के रथ 'नंदिघोष' और 15 दिन बीमार रहने की अनोखी परंपरा
देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़
जय जगन्नाथ! पुरी में उमड़ा आस्था का महासैलाब; जानिए महाप्रभु के रथ 'नंदिघोष' और 15 दिन बीमार रहने की अनोखी परंपरा
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जय जगन्नाथ! पुरी में उमड़ा आस्था का महासैलाब; जानिए महाप्रभु के रथ 'नंदिघोष' और 15 दिन बीमार रहने की अनोखी परंपरा
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पुरी (ओडिशा): ओडिशा का पवित्र तटीय शहर पुरी एक बार फिर दुनिया के सबसे बड़े और प्राचीन धार्मिक आयोजनों में से एक 'जगन्नाथ रथ यात्रा' का गवाह बन रहा है। हर साल की तरह इस बार भी देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ से पुरी का 'बड़ा दांड' पट गया है।

इस पावन उत्सव के दौरान महाप्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा और सुदर्शन चक्र के साथ अपने मुख्य मंदिर के गर्भगृह से बाहर आकर तीन विशाल लकड़ी के रथों पर सवार होते हैं और लगभग दो मील दूर गुंडिचा मंदिर की यात्रा पर निकलते हैं। सात दिनों के प्रवास के बाद भगवान वापस मुख्य मंदिर लौटते हैं, जिसे 'बहुड़ा यात्रा' कहा जाता है।

यह केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं है, बल्कि यह आदिवासी परंपराओं, लोक प्रथाओं और शास्त्रीय हिंदू रीति-रिवाजों का एक अनूठा समागम है, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।

आस्था की डोरी: रथ छूने मात्र से कट जाते हैं सारे पाप

गुंडिचा यात्रा, घोष यात्रा और नवदिना यात्रा जैसे कई नामों से जानी जाने वाली यह रथ यात्रा हिंदू कैलेंडर के सबसे पवित्र अवसरों में से एक है। मान्यता है कि इस दिन स्वयं भगवान विष्णु के अवतार महाप्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों को दर्शन देने और उन पर कृपा बरसाने के लिए खुद चलकर आते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि रथ यात्रा के दौरान रथों को खींचना या सिर्फ उनकी रस्सियों को छू लेना ही वर्षों की तपस्या और दिव्य कृपा के बराबर पुण्य देता है।

हजारों साल पुरानी कला: कैसे बनते हैं महाप्रभु के दिव्य रथ?

इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता इसके तीन विशालकाय लकड़ी के रथ हैं, जिन्हें हर साल पूरी तरह नए सिरे से पारंपरिक रूप से 'फासी' और 'धौसा' जैसे विशेष पेड़ों की लकड़ियों से बनाया जाता है। इनका निर्माण पुश्तैनी बढ़ई (कारीगरों) की टीमें करती हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही तकनीकों का पालन करते हैं। रथों का निर्माण 'अक्षय तृतीया' के शुभ दिन से शुरू होता है। तीनों रथों की अपनी अलग पहचान और संरचना होती है:

रथ का नाम                    | भगवान               | ऊंचाई               | पहियों की संख्या    | कैनोपी का रंग 

नंदिघोष (Nandighosa)    | भगवान जगन्नाथ     | 45 फीट            | 16 पहिए               | लाल और पीला 

तालध्वज (Taladhwaja)    | भगवान बलभद्र      | 44 फीट            | 14 पहिए               | लाल और नीला 

दर्पदलन (Darpadalana)  | देवी सुभद्रा           | 43 फीट            | 12 पहिए               | लाल और काला

सभी रथों पर देवताओं की लकड़ी की मूर्तियाँ, अलग-अलग रंगों के चार घोड़े और उनके अपने सारथी होते हैं।

​जब 15 दिनों के लिए 'बीमार' पड़ जाते हैं भगवान!

​रथ यात्रा से पहले कई बेहद दिलचस्प और रहस्यमयी रस्में निभाई जाती हैं:

​स्नान यात्रा: सबसे पहले देवताओं को मंदिर के पवित्र कुएं से निकाले गए 108 कलशों के जल से शाही स्नान कराया जाता है।

​अनासरा: इस अत्यधिक स्नान के कारण माना जाता है कि भगवान बीमार पड़ जाते हैं। इसके बाद वे 15 दिनों तक जनता की नजरों से दूर रहते हैं। इस दौरान मंदिर के 'दैतापति' (जिनका संबंध आदिवासी परंपरा से है) उनकी गुप्त सेवा करते हैं और उन्हें जड़ी-बूटियों, फलों और जड़ों का विशेष भोग लगाया जाता है।

नव यौवन दर्शन: एकांतवास समाप्त होने पर 'नेत्रोत्सव' रस्म के साथ मूर्तियों को नया रंग-रोगन दिया जाता है, जिसे भगवान का नव यौवन रूप कहा जाता है। इसे देखने के लिए लाखों भक्त उमड़ पड़ते हैं।

​'पहंडी' और 'छेरा पहरा' की सबसे अनूठी रस्म

​यात्रा के दिन, भगवान को घंटियों, शंखों, मृदंग और डमरू की थाप पर एक विशेष लयबद्ध चाल से मंदिर से बाहर लाया जाता है, जिसे 'पहंडी' (Pahandi) कहते हैं। जैसे ही महाप्रभु सिंहद्वार से बाहर आते हैं, पूरा माहौल 'हरि बोल' और 'जय जगन्नाथ' के उद्घोष से गूंज उठता है।

​इसके बाद पुरी के राजा यानी गजपति महाराजा स्वयं आकर 'छेरा पहरा' (Chhera Pahanra) की रस्म निभाते हैं। वे एक सोने की झाड़ू से तीनों रथों के चबूतरे को साफ करते हैं और उन पर सुगंधित जल व फूल छिड़कते हैं। यह सदियों पुरानी परंपरा यह संदेश देती है कि भगवान के सामने हर इंसान बराबर है, चाहे वह राजा हो या रंक।

​एकता और समानता का प्रतीक

​इसके बाद सबसे प्रतीक्षित क्षण आता है—रथ खींचना। सबसे पहले भगवान बलभद्र का रथ आगे बढ़ता है, फिर देवी सुभद्रा का और अंत में महाप्रभु जगन्नाथ का नंदिघोष रथ खिंचता है। जाति, धर्म और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर, लाखों हाथ जब एक साथ रथ की रस्सियों को खींचते हैं, तो वह दृश्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवता और सामूहिक समरसता का सबसे बड़ा प्रतीक बन जाता है।

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